1. प्रस्तावना: दिल्ली की हवा और आम आदमी की आवाज़
दिल्ली-NCR की हवा कब तक ज़हरीली रहेगी? ये सवाल हर उस परिवार के लिए जिंदा है जिन्हें सर्दियों में मास्क पहनना मजबूरी लगती है, स्कूल बंद होते हैं और अस्पतालों में सांस लेने वाले मरीजों की भीड़ बढ़ जाती है। मैंने भी इस प्रदूषण से होने वाली तकलीफों को नजदीक से महसूस किया है। मेरे पड़ोसी का बच्चा पिछले साल अस्थमा के कारण कई बार अस्पताल गया। ऐसे में जब सरकार ने 2025 में बताया कि वो आसमान से बारिश कराकर हवा साफ करेगी, तो मन में आशा जगी कि कहीं ये सच में हवा की सांस तो नहीं लौटा देगी? पर सवाल ये भी उठता है — क्या ये तकनीक सचमुच कारगर है या फिर बस एक दिखावा?2. क्लाउड सीडिंग क्या है? सरल भाषा में समझें
आपने कई बार बारिश देखि होगी कि बादल घने होते हैं और बारिश शुरू हो जाती है। क्लाउड सीडिंग पुराने बादलों में कुछ खास केमिकल्स डालने की प्रक्रिया है जो बारिश को बढ़ावा देते हैं। इसमें विमान से सिल्वर आयोडाइड जैसे द्रव्यमान बादलों में छोड़े जाते हैं। ऐसे समझिए जैसे आप सूखे पत्ते पर पानी की बूंदें गिराने के लिए छोटी-छोटी बूँदें लाते हैं, जो बड़ी बूंद बनकर बारिश करती हैं।3. दिल्ली सरकार ने अब तक क्या किया?
2025 में IIT कानपुर के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर दिल्ली सरकार ने बुराड़ी में क्लाउड सीडिंग का ट्रायल किया जो सफल रहा। अब योजना है कि अक्टूबर 2025 के अंत तक पूरे शहर में कृत्रिम बारिश कर प्रदूषण घटाया जाए। पर इसका मतलब ये नहीं कि प्रदूषण की जड़ खत्म हो जाएगी।4. आम जनता क्या सोचती है?
मेरे मुल्क की जनता को हर साल प्रदूषण का सामना करना पड़ता है। हमने कई सालों से प्रदूषण के खिलाफ आवाज उठाई लेकिन समस्या जस की तस बनी रही। सोशल मीडिया पर #FakeRain, #DelhiPollutionCrisis जैसे टैग ट्रेंड करते हैं। लोगों को लगता है कि सरकार सिर्फ दिखावे के लिए कदम उठा रही है। असली सवाल ये है कि क्या ये बारिश प्रदूषण को जड़ से खत्म कर पाएगी?5. फायदे: एक झलक - असली राहत?
कृत्रिम बारिश से कुछ घंटों में PM2.5 और PM10 कण कम हो जाते हैं, जिससे सांस लेने में आराम मिलता है। बच्चों को स्कूल भेजना आसान होता है, और दिल के मरीजों की संख्या कम हो सकती है। बारिश से मिट्टी और जल की नमी भी बढ़ती है, जो अगली बार प्रदूषण कम करने में मददगार हो सकती है।6. नुकसान और सीमाएं: सच्चाई क्या कहती है?
लेकिन दोस्तों, ये सिर्फ एक तात्कालिक राहत है। बादल, नमी का होना और सही मौसम होना ज़रूरी है। साथ ही, सिल्वर आयोडाइड जैसे रसायनों का ज्यादा इस्तेमाल soil और water pollution का कारण बन सकता है। हर साल करोड़ों रुपए खर्च कर के भी ये प्रक्रिया प्रदूषण का स्थायी इलाज नहीं कर पाती।lvinar dapibus leo.7. असली समाधान की ओर: आपकी सोच, सरकार की जिम्मेदारी
हमारी हवा को साफ करने के लिए सिर्फ कृत्रिम बारिश नहीं, बल्कि प्रदूषण के सारे स्रोतों — जैसे पराली जलना, वाहनों की संख्या, कारखानों से निकलने वाला धुआं — को रोकना होगा। सरकार को चाहिए कि वह तकनीकी उपायों के साथ साथ किसानों, उद्योगों, आम जनता के लिए ऐसे अभियान चलाए जिससे प्रदूषण के स्थायी समाधान निकले।8. निष्कर्ष: उम्मीद और हकीकत में फर्क
कृत्रिम बारिश एक उम्मीद की किरण है लेकिन इससे हटकर असली बदलाव जरूरी है। ये तकनीक दिल्ली-NCR के प्रदूषण संकट के लिए फिलहाल एक झटके जैसी है, जो मौसम को बेहतर कर सकती है पर प्रदूषण की जड़ मिटा नहीं सकती। अंत में यही कहूँगा—आसमान से बहती बारिश से ज़्यादा ज़रूरी है ज़मीन पर मजबूत नीतियां, जन जागरुकता और जवाबदेही। तभी दिल्ली-एनसीआर की हवा सचमुच साफ़ हो पाएगी।FAQ सेक्शन
Q1: दिल्ली-NCR में कृत्रिम बारिश कैसे काम करती है?
A: कृत्रिम बारिश में बादलों में सिल्वर आयोडाइड और अन्य रसायनों का छिड़काव किया जाता है, जिससे बादल में पानी की बूंदें बनती हैं और बरसात होती है।Q2: क्या कृत्रिम बारिश से प्रदूषण कम होगा?
A: कृत्रिम बारिश से प्रदूषण थोड़े समय के लिए कम होता है लेकिन इसका प्रभाव अस्थायी होता है, स्थायी सुधार के लिए प्रदूषण के स्रोतों को नियंत्रित करना जरूरी है।Q3: कृत्रिम बारिश से स्वास्थ्य या पर्यावरण को नुकसान हो सकता है?
A: सिल्वर आयोडाइड जैसे रसायन पर्यावरण और स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकते हैं, इसलिए सावधानी और निगरानी जरूरी है।Q4: दिल्ली सरकार ने कृत्रिम बारिश के लिए क्या कदम उठाए हैं?
A: IIT कानपुर के साथ मिलकर क्लाउड सीडिंग ट्रायल किए गए हैं, और बड़े पैमाने पर कृत्रिम बारिश का मिशन अक्टूबर 2025 से चालू है।Q5: कृत्रिम बारिश या क्लाउड सीडिंग क्या है और इसकी वैज्ञानिक प्रक्रिया क्या है?
A: क्लाउड सीडिंग एक तकनीक है जिसके तहत विशेष रसायन जैसे सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड या ड्राई आइस को बादलों में डाला जाता है ताकि पानी की बूंदें बन सकें और बारिश हो। यह प्रक्रिया जलवायु विज्ञान की संज्ञानात्मक विधि है जिसमें वाहनों या विमान के माध्यम से रसायनों का छिड़काव किया जाता है। बादलों में मौजूद जल वाष्प कणों के चारों ओर संघनित होकर वर्षा के रूप में गिरते हैं। यह तकनीक तभी सफल होती है जब बादल नमीयुक्त और ऊंचाई पर उपस्थित हों।Q6: दिल्ली-NCR में कृत्रिम बारिश की क्यों आवश्यकता पड़ी?
A: दिल्ली-NCR क्षेत्र प्रदूषण के गंभीर संकट से जूझ रहा है, विशेषकर सर्दियों में जब औद्योगिक, ट्रैफिक और कृषि (पराली जलाने) से भारी PM2.5 और PM10 प्रदूषक हवा में फैलते हैं। यह हवा की गुणवत्ता को खतरनाक स्तर तक गिरा देते हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। स्थायी उपायों के साथ, कृत्रिम बारिश को एक तात्कालिक उपाय के रूप में अपनाया गया ताकि प्रदूषकों को नीचे गिराकर हवा को तुरंत कुछ समय के लिए साफ़ किया जा सके।Q7: कृत्रिम बारिश की वर्तमान तकनीकी सीमाएँ और चुनौतियाँ क्या हैं?
A: कृत्रिम बारिश तकनीक मौसम की अनुकूलता पर निर्भर है; यह तभी कारगर होती है जब बादल, नमी एवं वातावरण के अन्य कारक अनुकूल हों। इसके अतिरिक्त, क्लाउड सीडिंग में प्रयुक्त रसायन जैसे सिल्वर आयोडाइड का दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभाव अभी पूरी तरह से ज्ञात नहीं है। आर्थिक दृष्टिकोण से भी यह महंगी प्रक्रिया है और इसके प्रभाव अस्थायी होते हैं, जिससे यह प्रदूषण के स्थायी समाधान के रूप में अपर्याप्त माना जाता है।Q8: कृत्रिम बारिश के आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभाव क्या हैं?
A: आर्थिक रूप से, कृत्रिम बारिश अभियान काफी महंगे होते हैं; दिल्ली में प्रति अभियान ₹3.21 करोड़ से अधिक का खर्च आता है। पर्यावरणीय दृष्टि से, रसायनों के संभावित विषाक्त प्रभाव मिट्टी, जल स्रोत और जीव-जंतुओं पर पड़ सकते हैं। साथ ही, कृत्रिम बारिश से प्राकृतिक वर्षा प्रणाली में असंतुलन आ सकता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में सूखा या अतिवृष्टि की समस्या हो सकती है।Q9: भारत के पर्यावरण नीति में कृत्रिम बारिश की क्या भूमिका है और इसे UPSC सिलेबस में कैसे देखा जाना चाहिए?
A: कृत्रिम बारिश पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन प्रबंधन की तकनीकी विधि के रूप में उभर रही है, जिसका उद्देश्य प्रदूषण नियंत्रण और जल संरक्षण है। UPSC परीक्षा में इसे पर्यावरणीय तकनीकों, जलवायु नीति, एवं शासन की समग्र समझ के तहत अध्यायों में शामिल किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, नीति निर्माण में वैज्ञानिक प्रगति, तकनीकी चुनौतियों, और सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों का समावेश परीक्षा की दृष्टि से आवश्यक है।Q10: क्लाउड सीडिंग और कृत्रिम बारिश कौन-कौन से देश उपयोग कर रहे हैं, और कौन से प्रमुख परिणाम सामने आए हैं?
A: अमेरिका, चीन, संयुक्त अरब अमीरात, रूस और भारत जैसे देश क्लाउड सीडिंग तकनीक का प्रयोग करते रहे हैं, विशेषकर सूखे और प्रदूषण वाले क्षेत्रों में। इन देशों में परिणाम मिश्रित रहे हैं – कुछ स्थानों पर वर्षा में वृद्धि हुई, जबकि अन्य जगह स्थायी सुधार नहीं दिखा। वैज्ञानिक समुदाय में इस तकनीक को लेकर सावधानी बरती जाती है और इसे एक पूरक उपाय के रूप में देखा जाता है, न कि एकमात्र समाधान के रूप में।#50centsias
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Rajni Chaudhary
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